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मसीह के साथ चलने के लिए तीन अलौकिक बातों पर हमें विश्वास करना अनिवार्य है:-
1) कुंवारी मरियम के द्धारा यीशु का जन्म निष्पाप, निर्दोष, निष्कलंक
2) मृतक में से जी उठना - पुनर्जीवित होना
3) यीशु मसीह फिर आने वाला है - कलीसिया एवं संसार के लिए
तीसरी बात के लिए हमें इंतजार करना है - बाट जोहना है - राह तकना है और जागते रहना है अर्थात तैयार रहना है - सावधान रहना है।
तीसरी बात के लिए हमें इंतजार करना है - बाट जोहना है - राह तकना है और जागते रहना है अर्थात तैयार रहना है - सावधान रहना है।
जब दिन, तारीख, महीना एवं साल मालूम हो तो इंतजार करना आसान है पर जब हमें कुछ भी पता नहीं तब न तो बाट जोहना आसान है और न जागते रहना आसान है। तब प्रश्न उठता है इस आग को कैसे जलाए रखें।
कुलुस्सियों 3:4 जब मसीह जो हमारा जीवन है, प्रकट होगा, तब तुम भी उसके साथ महिमा सहित प्रगट किए जाओगे।
हमें एक धन्य आशा दी गई है - शारीरिक जीवन के बाद भी एक महिमामय जीवन है जिसे हमारा प्रभु यीशु अपने आगमन पर देने वाला है जो केवल विश्वासियोँ के लिए ही है। प्रकाशित वाक्य 22:12 देख मैं शीघ्र आने वाला हूं, और हर एक के काम के अनुसार बदला देने के लिए प्रतिफल मेरे पास है।
यहाँ प्रतिफल सिर्फ भली वस्तुऐं ही नहीं है वरन उसमें न्याय और दंड भी शामिल हैं। हम अपने इस सांसारिक जीवन में, जीवन के महत्व को नजरअंदाज करते हुए अधिकांश पार्थिव बातों पर अपना मन लगाते हैं और यही सोचते हैं कि बस इसे भोग ले। एक मसीही होने के बावजूद भी हमारी प्राथमिकताएं क्या होनी चाहिए जानते हुए भी हम करना नहीं चाहते।
लूका 10:27 तू प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे मन और सारे प्राण और अपनी सारी शक्ति और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख; और अपने पड़ोसी से अपने सामान प्रेम रख।
क्या स्पष्ट रीति से वचन हमारे जीवन की प्राथमिकता के बारे में अंकित नहीं करता? परमेश्वर को प्राथमिकता देने के बजाय हम आंखों की अभिलाषा, शरीर की अभिलाषा और जीविका के घमंड में फंसकर जीवन नहीं बिताते है क्या?
मानव जीवन में उम्र एक बहुत बड़ी चीज है - हम क्रमश: शिशु से बालपन, बालक से युवा संधि काल, युवावस्था, पति या पत्नी बनने का समय, पिता-माता बनने का समय, बच्चों की परवरिश का दौर, प्रौढ़ावस्था और अंत में प्रस्थान करने का वक्त आ जाता है। सवाल है हम जागते कब हैं? कब हमें यह एहसास होता है कि हम मसीहियों का अपने परमेश्वर के प्रति कुछ जिम्मेदारियां हैं कर्तव्य है? क्या बाइबल अपने वचन के माध्यम से स्पष्ट संदेश नहीं देता है?
सभोपदेशक 12:13 सब कुछ सुना गया; अन्त की बात यह है कि परमेश्वर का भय मान और उसकी आज्ञाओं का पालन कर; क्योंकि मनुष्य का सम्पूर्ण कर्त्तव्य यही है।
राजा सुलेमान की कहानी हमारे लिए आंख खोलनेवाली है यद्यपि उसने मांगा और परमेश्वर ने उसे बुद्धि का वरदान दिया फिर भी उसने अपनी आंखों की अभिलाषा, शरीर की अभिलाषा और धन-दौलत एवं रथों पर अंत में भरोसा किया जो उसके पतन का कारण बना। मत्ती 16:26 यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करें और अपने प्राण की हानि उठाएं तो उसे क्या लाभ होगा? संसार के सारे सुख-वैभव, यश, नाम प्रतिष्ठा यही रह जाते हैं सिर्फ एक बात परमेश्वर देखता है मनुष्य में कि इसके आंतरिक मनुष्यत्व में परिवर्तन हुआ है अथवा नहीं, नई सृष्टि की ओर कदम बढ़ा चुका है कि अभी संसार और शरीर में फंसा हुआ है।
जागने का अर्थ है सचेत वा सतर्क रहना और बाट जोहने का अर्थ हे परमेश्वर से लिपटे रहना। वचन हमें बतलाता है हम अंतिम पीढ़ी के लोग हैं। लैव्यव्यवस्था 23:1, 2, 5, 6, 7, 15, 23, 24, 27, 33 & 34 यहां यहूदियों को 7 पर्व परमेश्वर द्धारा मनाने को कहा गया था।
1) फसह का पर्व - Feast of Passover
2) अख़मीरी रोटी का पर्व - Feast of Unleaven bread
3) पहले फल का पर्व - Feast of first Fruit
4) सप्ताहों का पर्व - Feast of Week (Penticost)
5) तुरहियों का पर्व - Feast of Trumpet
6) प्रायश्चित का दिन - Day of Atonement
7) झोपड़ियो का पर्व - Feast of Tabernacleअब बाकी क्या रहा मसीहियों के लिए तुरहियों का पर्व - सातवें महीने के पहले दिन को तुरहियों के पर्व को मनाने की आज्ञा दी है परमेश्वर के ठीक हिब्रू कैलेंडर के हिसाब से। यहां सवाल यह है कि फसह का पर्व मनाते मनाते कब यहूदी यीशु को फसह के दिन ही क्रूस पर चढ़ा दिए यह उन्हें समझ में न आया परंतु हमारे परमेश्वर पिता ने अपने उद्देश्य एवं योजना को पूरा करने के लिए जिस दिन और समय को चुना उसे न तो मनुष्य समझ सका और ना शैतान समझ पाया। इसलिए प्रभु यीशु मसीह ने छटवीं वाणी में कहा "पूरा हुआ"। उद्धार का काम पूरा हुआ, क्षमादान का काम पूरा हुआ और पिता परमेश्वर से मेल-मिलाप का काम पूरा हुआ।
आज कलीसियाओं की जिम्मेदारियां क्या है? विश्वासियों को परमेश्वर के राज्य में प्रवेश कराना है, परंतु हो क्या रहा है? कलीसिया संसारिकता के मायाजाल में फंसी हुई है। अनैतिकता एवं अधर्म में नूह के जमाने से भी आगे निकल गई। कलीसियाओं को यीशु की महिमा करनी चाहिए तो कलीसिया श्रेष्ठता की दौड़ में शामिल है। रोमियो 8:9 कहता है "यदि किसी में मसीह का आत्मा नहीं तो वह उसका जन नहीं"। पवित्र आत्मा के इस पृथ्वी में उपस्थित होने के बावजूद भी न उसकी उपस्थिति समझ पाते हैं न उसका समर्थ। जागेंगे नहीं तो बाट कैसे देखंगे? 1यूहन्ना 3:3 "और जो कोई उस पर यह आशा रखता है, वह अपने आप को वैसा ही पवित्र करता है, जैसा वह पवित्र है"। 1पतरस 1:16 "पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूं।" किसके लिए कहा गया है - कलीसिया- मसीह की दुल्हन के लिए। आज भी अनुग्रह का युग चल रहा है - संसार में उथल-पुथल के बीच, देशों के तनावों व लड़ाईयों के बीच, राजनैतिक समीकरणों के बीच, भूकंप, जंगलों की आग, बाढ़, सुनामी, चक्रवाती तूफान, रिफ्यूजी समस्या, न्यूक्लीयर युद्ध, अर्थव्यवस्था, मसीहियों पर सताव क्या यह मत्ती 24 को समझने के लिए पर्याप्त नहीं है?
प्रिय विश्वासी भाई एवं बहनों समय कम है तैयार रहना ही हमारे दैनिक कर्तव्य है क्योंकि आनेवाली महिमा के सामने इस संसार की कुछ भी चीजें वा बातों का कोई भी मूल्य नहीं। सब व्यर्थ एवं फीका है। जलवायु परिवर्तन इस बात का संकेत दे रही है कि पृथ्वी भी जच्चा की पीड़ा का अनुभव कर रही है और अपने छुटकारे का इंतजार कर रही है। हम तो सौभाग्यशाली हैं कि इतनी बड़ी धन्य आशा हमें दी गई है- हियाव बाँधकर हम अनुग्रह के सिंहासन के पास आएं कि हम सब पर दया हो।
अब वो समय दूर नहीं क्योंकि रंगमंच का परदा गिरने वाला है। परमेश्वर ने विश्वव्यापी कोरोना महामारी का संकेत दे दिया है अब संसार चैन की सांस नहीं ले सकता। जितना सुख भोगने का समय था, जितना मनमानी करने का समय था सब बीत चुका है कलीसिया भी पीड़ाओं के दौर से होकर गुजर रही है। अतः प्रथम जागते रहना है तभी हम बाट जोहते हुए पाएं जाएंगे ठीक उस पांच बुद्धिमान कुँवारियोँ के समान।
परमेश्वर वचन के माध्यम से कलीसिया को प्रेरित करे अपनी महिमा के लिए। आमीन!
By Rev. Dr. Satish Kumar Kujur
कृपया इन वचनो को अपने परिवार, रिस्तेदारो और प्रिय मित्रो को अवश्य शेयर करें।
धन्यवाद !

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